भारत के प्रमुख पर्वतों का विवरण।

हिमालय पर्वत श्रृंखला में दुनिया की लगभग हर सबसे ऊँची चोटी है और औसतन उनकी 100 से अधिक चोटियाँ हैं जिनकी ऊँचाई 7200 मीटर से अधिक है। नंगा पर्वत और नमचा बरवा को हिमालय का पश्चिमी और पूर्वी बिंदु माना जाता है। माउंट एवरेस्ट 8848 मीटर पर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है।

भारत के प्रमुख पर्वतों का विवरण।

भारत के पर्वत देश के पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत के जादुई पहाड़ों को देवताओं के निवास के रूप में जाना जाता है, जो ताजी हवा, धार्मिक महत्व और रोमांचकारी साहसिक खेलों के अवसरों के कारण पर्यटकों के बीच प्रसिद्ध हैं। ये सभी पहाड़ अप्रैल और मई के दौरान भारत के अधिकांश हिस्से को कवर करने वाली भीषण गर्मी से एक शानदार कायाकल्प प्रदान करते हैं। 
भारत के प्रमुख पर्वतों का अवलोकन कुछ इस प्रकार है।
1. हिमालय पर्वत

हिमालय भारत के सबसे पवित्र पर्वतों में से एक है। हिमालय की श्रृंखलाओं में अनेक धार्मिक स्थल भी हैं। इनमें हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गोमुख, देव प्रयाग, ऋषिकेश, कैलाश मानसरोवर तथा अमरनाथ प्रमुख हैं। भारतीय ग्रंथ गीता में भी इसका उल्लेख मिलता है। महाभारत के अनुसार, पांडव इसी पर्वत को पार कर स्वर्ग गए थे। पुराणों में इसे पार्वतीजी का पिता कहा गया है। पुराणों के अनुसार गंगा और पार्वती इनकी दो पुत्रियां हैं और मैनाक, सप्तश्रृंग आदि सौ पुत्र हैं।भौगोलिक दृष्टि से हिमालय एक पर्वत तंत्र है, जो भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया और तिब्बत से अलग करता है। यह पर्वत तंत्र मुख्य रूप से तीन समानांतर श्रेणियों- महान हिमालय, मध्य हिमालय और शिवालिक से मिलकर बना है जो पश्चिम से पूर्व की ओर एक चाप की आकृति में लगभग 2500 किमी की लंबाई में फैली हैं।

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हिमालय पर्वत पांच देशों की सीमाओं में फैला है। ये देश हैं- पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान और चीन। हिमालयपर्वत की एक चोटी का नाम बन्दरपुंछ है। यह चोटी उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित है। इसकी ऊंचाई 20,731 फुट है। इसे सुमेरु भी कहते हैं। हिमालय के प्रांगण में बद्रीनाथ, केदारनाथ, मानसरोवर आदि अनेक तीर्थ तथा शिमला, मसूरी, दार्जीलिंग आदि नगर हैं। यह बहुमूल्य रत्नों एवं औषधियों का प्रदाता हैं।  गौरीशंकर, कंचनजंगा, एवरेस्ट, धौलागिरि, गोसाई स्थान, अन्नपूर्णा आदि उसकी विशिष्ट चोटियां विश्व की सर्वश्रेष्ठ चोटियों में से एक हैं। माउंट एवरेस्ट/ सगरमाथा : हिमालय में ही विश्व की सबसे ऊंची चोटी गौरीशंकर (माउंट एवरेस्ट) है। एवरेस्ट एशिया महाद्वीप में है और हिमालय का हिस्सा है।  यह नेपाल और चीन की सीमा पर मौजूद है। यह पहाड़ 8,848 मीटर ऊंचा है।

2. अरावली
यह पर्वत प्राचीन भारत के सप्तकुल पर्वतों में से एक है। इसे भी हिन्दूकुश पर्वत की तरह पारियात्र या पारिजात पर्वत कहा जाता है। वह इसलिए कि यहां पर पारिजात वृक्ष पाया जाता है। भारत की भौगोलिक संरचना में अरावली प्राचीनतम पर्वत है। भू-शास्त्र के अनुसार भारत का सबसे प्राचीन पर्वत अरावली का पर्वत है। माना जाता है कि यहींपर श्रीकृष्ण ने वैकुंठ नगरी बसाई थी। राजस्थान यह पहाड़ नैऋत्य दिशा से चलता हुआ ईशान दिशा में करीब दिल्ली तक पहुंचा है। अरावली या 'अर्वली' उत्तर भारतीय पर्वतमाला है। राजस्थान राज्य के पूर्वोत्तर क्षेत्र से गुजरती 560 किलोमीटर लंबी इस पर्वतमाला की कुछ चट्टानी पहाड़ियां दिल्ली के दक्षिण हिस्से तक चली गई हैं। अगर गुजरात के किनारे अर्बुद या माउंट आबू का पहाड़ उसका एक सिरा है तो दिल्ली के पास की छोटी-छोटी पहाड़ियां धीरज (The Ridge) दूसरा सिरा। 

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आबू के पहाड़ का सबसे ऊंचा शिखर सिरोही जिले में गुरुशिखर 1727 मी. से भी अधिक ऊंचा है जबकि धीरज टेकरियों की ऊंचाई 50 फुट की ही होगी। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, गुजरात, पंजाब आदि राज्यों में इस पर्वत की श्रृंखलाएं फैली हुई हैं। ऋग्वेद में अर्बुद नामक असुर का जिक्र आता है। अरावली परिसर में जन्म लेने वाली नदियों की संख्या भी कम नहीं है। बनास, वेदवती (बेरछ), वृत्रघ्नी (उतंगन), सिंधु (काली सिंध), वेण्या या वर्णाशा नंदिनी अथवा चंदना (साबरमती), सदानीरा या सतीरापारा (पार्वती), चर्मण्वती या धन्वती (चंबल), तूपी या रूपा या सूर्य (गंभीर), विदिशा या विदुषा (बेस), वेत्रवती या वेणुमती (बेतवा), शिप्रा या अवर्णी या अवंती।

3.विंध्याचल पर्वत
यह भारत के पवित्र पर्वतों में से एक है। विंध्याचल पर्वत शृंखला भारत के पश्चिम-मध्य में स्थित प्राचीन गोलाकार पर्वतों की श्रृंखला है जो भारत उपखंड को उत्तरी भारत व दक्षिणी भारत में बांटती है। इस श्रृंखला का पश्चिमी अंत गुजरात में पूर्व में वर्तमान राजस्थान व मध्य प्रदेश की सीमाओं के नजदीक है। यह श्रृंखला भारत के मध्य से होते हुए पूर्व व उत्तर से होते हुए मिर्जापुर में गंगा नदी तक जाती है। पुराणों के अनुसार इस पर्वत ने सुमेरू से ईर्ष्या रखने के कारण सूर्यदेव का मार्ग रोक दिया था और आकाश तक बढ़ गया था, जिसे अगस्त्य ऋषि ने नीचे किया। यह शरभंग, अगस्त्य इत्यादि अनेक श्रेष्ठ ऋषियों की तपोस्थली रहा है। हिमाचल के समान इसका भी धर्मग्रंथों एवं पुराणों में विस्तृत उल्लेख मिलता है। पुराणों के अनुसार इस पर्वत ने सुमेरू से ईर्ष्या रखने के कारण सूर्यदेव का मार्ग रोक दिया था और आकाश तक बढ़ गया था जिसे अगस्त्य ऋषि ने नीचे किया। यह शरभंग, अगस्त्य इत्यादि अनेक श्रेष्ठ ऋषियों की तप:स्थली रहा है। 

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दक्षिण भारत और हिन्द महासागर से संबंधी अगस्ति (अगस्त्य) मुनि की गाथा है। उन्होंने विंध्याचल के बीच से दक्षिण का मार्ग निकाला। किंवदंती है कि विंध्याचल पर्वत ने उनके चरणों पर झुककर प्रणाम किया। उन्होंने आशीर्वाद देकर कहा कि जब तक वे लौटकर वापस नहीं आते, वह इसी प्रकार झुका खड़ा रहे। वे वापस लौटकर नहीं आए और आज भी विंध्याचल पर्वत वैसे ही झुका उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। यहां के पर्वतों की कंदराओं में कई प्राचीन ऋषियों के आश्रम आज भी मौजूद हैं। यह क्षेत्र पहले ऋषि-मुनियों का तप स्थल हुआ करता था। पर्वतों की कंदराओं में साधना स्थल, दुर्लभ शैलचित्र, पहाड़ों से अनवरत बहती जल की धारा, गहरी खाइयां और चारों ओर से घिरे घनघोर जंगलों पर अब संकट के बादल घिर गए हैं। यहीं पर भीमबैठका जैसी गुफाएं हैं।

4.रैवतक
रैवतक पर्वत जिला जूनागढ़, काठियावाड गुजरात में स्थित है .इसे गिरनार नाम से भी जाना जाता है. प्रभास का क्षेत्र इसी के अंतर्गत आता है. दक्ष की सत्ताईस कन्याओं का चन्द्रमा से विवाह हुआ परन्तु इनमे से रोहिणी को विशेस प्रेम करने के कारण उसे क्षय रोग का शाप मिला. तब चन्द्रमा ने रैवतक पर्वतमाला के प्रभास क्षेत्र में समुद्र किनारे शिवलिंग की स्थापना करके दस करोड़ मन्त्र का जाप कर शिवजी को प्रसन्न किया. शिवजी ने कहा कि - पंद्रह दिन तुम्हारी कलाएं क्षीण होगी तथा पंद्रह दिन बढ़ेगी. सोम (चन्द्रमा) द्वारा स्थापित यह लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम सोमनाथ कहलाया.

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विष्णु पूराण के अनुसार महाराजा आनर्त के पुत्र पराक्रमी रैवतक हुए इन्ही के नाम से इस पर्वत का नाम रैवतक हुआ.राजा रैवतक की पुत्री रेवती का विवाह श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम से हुआ यहीं से अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा का युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की अनुमत से हरण किया था. जैन मत के पांच पवित्र तीर्थों में से एक पालिताना इसी पर्वत के अंतर्गत आता है. इस पर्वत पर दत्तात्रेय और गौमुखी गंगा के मंडित तथा तीन जैन मंदिर बने हुए है. रैवतक पर्वत क्षेत्र सिंहों तथा गीर नस्ल की गायों के लिए प्रसिद्ध है।

5. महेंद्र
उड़ीसा राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित यह पर्वत भारत के प्राचीन पर्वतों में से एक है.यह पूर्वी घाट का सबसे ऊँचा पर्वत है और गोंडवानालैण्ड का हिस्सा है इसकी ऊंचाई १५०० मीटर है .माना जाता है कि क्षत्रियों को नष्ट करके परशुराम ने सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर डी थी. फिर उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने अस्त्र शास्त्र त्याग दिए थे और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेंद्र पर्वत पर आश्रम बना कर रहने लगे . वे आज भी यहाँ रहते है.रामायण के अनुसार महेंद्रगिरी से ही हनुमानजी श्रीलंका गए थे.पुराणों के अनुसार महेंद्रगिरी तीर्थ पर स्नान करने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलाता है. 
इस पर्वत के पूर्वी ढाल पर युधिष्ठिर का बनवाया हुआ आकर्षक मंदिर है.यहाँ कुन्ती , भीम युधिष्ठिर के अतिरिक्त ब्रह्मा जी का मंदिर दर्शनीय है. इस पर्वत श्रेणी में बसे कलिंग देश में वैतरणी नदी प्रवाहमान है जिसमे पाण्डवों सहित द्रौपदी ने अपने पितरों का तर्पण किया था. चार धामों में से एक धाम जगन्नाथ धाम और चार पिठों में से एक पीठ गोवर्धन पीठ इसी पर्वत श्रेणी में सागर तट पर स्थित है.

6. मलय पर्वत
मलय पर्वत पश्चिमी घाट के दक्षिणी छोर पर स्थित है. यह कावेरी के दक्षिण में पड़ता है.मलय पर्वत को सप्त ऋषियों में से एक वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई महर्षि अगस्त्य की तपो भूमि है. चन्दन के लिए विख्यात यह पर्वत दक्षिणी कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू में फैला हुआ है.इसे निलगिरी नाम से भी जाना जाता है. इसका उत्तरी भाग मैसूर को स्पर्श करता है तथा दूसरी और चंद्रगिरी पर्वत है भगवान विष्णु को प्रिय यहाँ का मलयगिरी चन्दन बहुत प्रसिद्द है.  इसके ढाल पर अनेक प्रकार की औषधियों और मसालों की खेती की जाती है. आद्य शंकराचार्य की जन्मस्थली कालडी इसी पर्वत श्रेणी में है.

7.सह्याद्री
 सह्याद्री पर्वत श्रृंखलाएं भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है. ये जैव विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध है. जैव विविधता में इसका विश्व में आठवां स्थान है. इसी कारण यूनेस्को ने इस पर्वत श्रृंखला के ३९ स्थानों को विश्व धरोहर घोषित किया. ये पर्वत श्रृंखलाएं गुजरात व महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होकर गोआ, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल से होते हुए कन्याकुमारी तक फैली हुई है. इनमे ८४ प्रकार के उभयचर, १६७ प्रकार की चिड़िया, १६०० प्रकार फूल विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं मिलते है.

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गोदावरी, कृष्णा जेसी नदियों का उद्गम इन्ही श्रृंखलाओं से हुआ है. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रसिद्ध त्र्यम्बकेश्वर, घुश्मेश्वर और भीमशंकर इसी पर्वत पर स्थित है. सह्याद्री शिवाजी महाराज की कर्मभूमि के साथ साथ उनके पराक्रम की साक्षी भी है. इसमें शिवनेरी, पन्हालगढ़, प्रतापगढ़, चाकन, रायगढ़ जैसे छत्रपति शिवाजी के अनेक किले स्थित है.

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